
डॉक्टरों ने साफ शब्दों में कहा था – ब्लड कैंसर गंभीर है और इलाज लंबा व कठिन होगा। 52 वर्षीय इस व्यक्ति के सामने ल्यूकेमिया और लिंफोमा जैसी जानलेवा बीमारियों की दोहरी चुनौती थी। कीमोथेरेपी और रेडिएशन की सलाह दी गई, लेकिन साथ ही मानसिक और शारीरिक मजबूती बनाए रखने पर भी जोर था।
इसी दौर में उन्होंने अपने जीवन में एक बड़ा बदलाव किया। मेडिकल निगरानी के साथ-साथ उन्होंने प्रकृति से जुड़ने का रास्ता चुना। ठंडे पानी में तैराकी, नियमित ध्यान और समय-समय पर जंगल में एकांत में रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। 4 डिग्री सेल्सियस के बर्फीले पानी में लंबी दूरी तक तैरना आसान नहीं था, लेकिन यह उनके लिए आत्मबल और अनुशासन का अभ्यास बन गया।
हर सप्ताह जंगल में अकेले समय बिताना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए अहम रहा। मोबाइल और शोर-शराबे से दूर रहकर उन्होंने तनाव कम करना सीखा। विशेषज्ञ मानते हैं कि तनाव कम होने और सकारात्मक जीवनशैली से इम्यून सिस्टम को सहारा मिलता है, हालांकि यह किसी भी बीमारी का अकेला इलाज नहीं हो सकता।
इलाज के दौरान हुए मेडिकल टेस्ट में सुधार के संकेत मिले, जिसने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। डॉक्टरों ने भी माना कि मानसिक दृढ़ता, अनुशासित जीवनशैली और नियमित फॉलो-अप का इलाज पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
आज 64 वर्ष की उम्र में वे फिटनेस और आत्मबल के प्रतीक बन चुके हैं। उनके नाम कठिन तैराकी और लंबे एकांत ध्यान से जुड़े रिकॉर्ड हैं। वे लोगों को यह संदेश देते हैं कि प्रकृति, अनुशासन और सकारात्मक सोच इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि इलाज का सहारा बन सकते हैं।
यह कहानी उम्मीद देती है – लेकिन साथ ही यह भी सिखाती है कि हर कदम डॉक्टरों की सलाह और विज्ञान के साथ चलकर ही उठाना चाहिए।
