प्रयागराज के माघ मेला क्षेत्र में मौनी अमावस्या के दौरान हुए विवाद ने अब और गंभीर रूप ले लिया है। ज्योतिष मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने साफ कर दिया है कि वे वसंत पंचमी के पावन अवसर पर भी संगम में स्नान नहीं करेंगे। उनका कहना है कि जब तक प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता और उन्हें सम्मानपूर्वक स्नान कराकर शिविर में प्रवेश नहीं कराया जाता, तब तक वे अपने निर्णय पर अडिग रहेंगे।

शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि मौनी अमावस्या के दिन प्रशासन ने उन्हें संगम में स्नान करने से रोका, जिससे उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुंचा। उन्होंने इसे केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और संत समाज के स्वाभिमान से जुड़ा विषय बताया। अपने शिविर में दिए गए बयान में उन्होंने कहा, “सम्मान से स्नान कराना कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और गरिमा का प्रश्न है। यदि गलती हुई है तो प्रशासन को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।”
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यह भी ऐलान किया कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे हर वर्ष माघ मेले में आकर फुटपाथ पर ही बैठेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह जिद नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का सवाल है। उनके इस रुख के बाद संत समाज में हलचल तेज हो गई है। कुछ संत उनके समर्थन में सामने आए हैं और इसे संतों के सम्मान से जुड़ा मामला बता रहे हैं, जबकि कुछ संत संवाद और समझौते के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने बयान दिया कि शंकराचार्य को संगम में स्नान कर लेना चाहिए और विवाद को समाप्त करना चाहिए। वहीं, कई धार्मिक और सामाजिक हस्तियों ने प्रशासन से संतों की गरिमा का ध्यान रखने की बात कही है।
वसंत पंचमी माघ मेले के प्रमुख स्नान पर्वों में से एक है, जिस पर देशभर से लाखों श्रद्धालुओं के प्रयागराज पहुंचने की संभावना रहती है। ऐसे में शंकराचार्य का यह फैसला प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। एक ओर विशाल भीड़ की सुरक्षा, यातायात और व्यवस्था संभालना है, तो दूसरी ओर संत समाज की भावनाओं को संतुलित रखना भी जरूरी है।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है और संवाद के जरिए समाधान निकालने के प्रयास संभव हैं, हालांकि अब तक किसी सार्वजनिक माफी या आधिकारिक बयान की घोषणा नहीं हुई है। उधर, श्रद्धालुओं के बीच भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। कई लोग शंकराचार्य के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि विवाद का जल्द समाधान होना चाहिए ताकि माघ मेले की पवित्रता और सौहार्द बना रहे।
