
Desk ASR
राजस्थान के एक छोटे से गाँव की यह कहानी सिर्फ शिक्षा की नहीं, बल्कि हौसले, जिद और सिस्टम को झकझोर देने वाली सच्चाई की कहानी है। कभी जिस सरकारी स्कूल की इमारत खंडहर बन चुकी थी, जहाँ सालों तक ताला लटका रहा और बच्चे खेतों व ईंट-भट्टों में काम करने को मजबूर थे — आज वही स्कूल देश को IAS और IPS अफसर दे रहा है। सीकर के नेछवा गाँव का यह स्कूल (Sikar Shiksha Samiti के तहत) कभी जर्जर था, लेकिन स्थानीय प्रयासों और समर्पण से यह फिर से जीवंत हुआ.
यहाँ से कई छात्रों ने UPSC में सफलता हासिल की है और IAS-IPS बने हैं, जिससे यह ग्रामीण भारत में शिक्षा के प्रकाशस्तंभ के रूप में उभरा है. इस बदलाव की शुरुआत न किसी बड़े नेता ने की, न किसी सरकारी योजना से। इसकी शुरुआत हुई गाँव के एक साधारण किसान की सोच से, जिसने यह मानने से इनकार कर दिया कि उसके गाँव के बच्चे पढ़ नहीं सकते। उसने बंद पड़े स्कूल का ताला खुलवाया, घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाई के लिए मनाया और सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी लड़ाई को आवाज़ दी।
धीरे-धीरे यह आवाज़ प्रशासन तक पहुँची। शिक्षकों की तैनाती हुई, स्कूल में लाइब्रेरी और स्मार्ट क्लास बनीं, बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मार्गदर्शन मिलने लगा। जो बच्चे कभी नाम लिखना नहीं जानते थे, वही आज UPSC और राज्य सेवा परीक्षाओं में सफलता हासिल कर रहे हैं।
आज इस गाँव के युवा देश के अलग-अलग हिस्सों में अफसर बनकर सेवा दे रहे हैं, लेकिन वे अपनी जड़ों को नहीं भूले। हर साल वे गाँव लौटते हैं और बच्चों से कहते हैं – “हम कर सकते हैं, तुम भी कर सकते हो।” यह कहानी सिर्फ एक गाँव की नहीं, बल्कि उस भारत की है जो संसाधनों से नहीं, संकल्प से आगे बढ़ता है।
