
Desk ASR
धरती से ऊपर का आसमान अब खाली नहीं रहा। लो-अर्थ ऑर्बिट में उपग्रहों की बढ़ती भीड़ ने अंतरिक्ष को एक अदृश्य जाम में बदल दिया है। इसी भीड़ से जन्म ले रहा है एक गंभीर खतरा – केसलर सिंड्रोम। इसका अर्थ है कि एक टक्कर से पैदा हुआ मलबा आगे और टक्करों को जन्म देता है, और यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता।
वैज्ञानिकों के आकलन में उभरकर आया 2.8 दिन की ‘क्रैश क्लॉक’ का संकेत बताता है कि औसतन हर ढाई से तीन दिन में किसी न किसी उपग्रह के बेहद करीब से गुजरने या टकराने की स्थिति बन रही है। यह घड़ी सिर्फ़ समय नहीं गिनती, बल्कि जोखिम का अलार्म बजाती है। एक बड़ी टक्कर सैकड़ों छोटे-छोटे टुकड़े बना सकती है, जो वर्षों तक कक्षा में घूमते रहेंगे और सुरक्षित उड़ान को असंभव बना देंगे।
भारत के लिए यह संकट सीधे डिजिटल जीवन से जुड़ा है। देश की संचार व्यवस्था, इंटरनेट बैकबोन, GPS नेविगेशन, बैंकिंग ट्रांजैक्शन, आपदा चेतावनी और मौसम पूर्वानुमान – सब कुछ उपग्रहों पर निर्भर है। अगर किसी प्रमुख ऑर्बिटल लेन में मलबे की परत बन गई, तो उपग्रहों का संचालन बाधित हो सकता है। नतीजा – नेटवर्क ठप, इंटरनेट स्लो या कुछ क्षेत्रों में पूरी तरह बंद।
ISRO और अन्य एजेंसियाँ टकराव से बचाव के लिए कक्षा बदलने, सटीक ट्रैकिंग और निष्क्रिय उपग्रहों को डी-ऑर्बिट करने की रणनीतियों पर काम कर रही हैं। मगर निजी सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन की तेज़ रफ्तार लॉन्चिंग ने संतुलन को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
अंतरिक्ष अब केवल विज्ञान की प्रयोगशाला नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अगर वैश्विक स्तर पर नियम, जिम्मेदारी और तकनीकी अनुशासन नहीं बढ़ा, तो आसमान में फैली यह भीड़ धरती पर डिजिटल सन्नाटे का कारण बन सकती है।
