
ASR डेस्क
पूरा बिहार इन दिनों कड़ाके की ठंड और घने कोहरे की चपेट में है। राजधानी पटना की तस्वीर सबसे ज्यादा बेचैन करने वाली है, जहां सर्द हवाओं और शीतलहर ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। सुबह से लेकर देर रात तक शहर धुंध की मोटी चादर में लिपटा रहता है। सड़कों पर दृश्यता कम होने से यातायात प्रभावित है और लोग जरूरी कामों के लिए भी घर से निकलने में हिचकिचा रहे हैं।
ठंड का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर दिख रहा है, जिनकी रोज़ी-रोटी सड़क से जुड़ी है। ऑटो-रिक्शा चालक, ई-रिक्शा चालक, ठेला-खोमचा लगाने वाले और दिहाड़ी मजदूर घंटों ठंड में खड़े रहने को मजबूर हैं। फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले बेघर लोगों के लिए यह ठंड किसी परीक्षा से कम नहीं। कई प्रमुख चौक-चौराहों पर अलाव की व्यवस्था न होने से लोग हाथ मलते हुए ठिठुरते नजर आ रहे हैं।
शहर के डाक बंगला चौराहा, गांधी मैदान, राजेंद्र नगर और कंकड़बाग जैसे इलाकों में सुबह-सुबह ठंड का असर साफ दिखाई देता है। लोग ऊनी कपड़ों में लिपटे, चाय की दुकानों के आसपास सिमटे हुए नजर आते हैं। बावजूद इसके, नगर प्रशासन की ओर से पर्याप्त अलाव या रैन बसेरों की व्यवस्था न होना सवाल खड़े करता है।
डॉक्टरों के अनुसार, इस तरह की शीतलहर में बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों को खास सतर्कता बरतने की जरूरत है। ठंड से बचाव के उपाय न होने पर सर्दी, खांसी और सांस की समस्याएं बढ़ सकती हैं।
पटना ही नहीं, पूरे बिहार में ठंड का यह दौर अभी और चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में जरूरत है कि प्रशासन संवेदनशीलता दिखाए, अलाव और अस्थायी आश्रयों की संख्या बढ़ाए, ताकि ठंड की मार झेल रहे लोगों को कुछ राहत मिल सके। सवाल यही है—जब ठंड अपने चरम पर है, तो इंतज़ाम कब होंगे?
