
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी के तीन विधायकों के बीच पिछले करीब 15 दिनों से संवाद ठप बताया जा रहा है। सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि ये तीनों विधायक जल्द ही बगावती कदम उठा सकते हैं और आरएलएम को अलविदा कहकर किसी दूसरे दल का दामन थाम सकते हैं। हाल ही में इन विधायकों की भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष निती नवीन से मुलाकात ने इन अटकलों को और हवा दे दी है।
अगर यह बगावत हकीकत में बदलती है तो इसका सीधा असर उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक सेहत पर पड़ना तय माना जा रहा है। आरएलएम पहले ही सीमित जनाधार और कमजोर संगठन से जूझ रही है। ऐसे में तीनों विधायकों का साथ छूटना पार्टी की विधानसभा में मौजूदगी को लगभग खत्म कर देगा। इससे उपेंद्र कुशवाहा की सौदेबाजी की ताकत भी काफी कम हो जाएगी, खासकर सत्तारूढ़ गठबंधन या भविष्य की राजनीतिक रणनीति के लिहाज से।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधायकों की बगावत से उपेंद्र कुशवाहा के सामने दोहरी चुनौती खड़ी होगी। एक तरफ संगठन को बचाने की लड़ाई होगी, तो दूसरी तरफ उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर भी असर पड़ेगा। माना जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे को राजनीति में आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। चर्चा है कि उन्हें एमएलसी बनवाकर नीतीश कैबिनेट में शामिल कराने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन पार्टी कमजोर होने की स्थिति में यह राह और मुश्किल हो जाएगी।
विधायकों की नाराजगी की वजहों को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के भीतर निर्णय प्रक्रिया, नेतृत्व की शैली और भविष्य की स्पष्ट रणनीति को लेकर असंतोष की बातें सामने आ रही हैं। अगर आरएलएम से यह टूट होती है तो उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति आने वाले दिनों में और संघर्षपूर्ण हो सकती है।
कुल मिलाकर, आरएलएम के लिए यह वक्त बेहद नाजुक है। तीन विधायकों की संभावित बगावत न सिर्फ पार्टी की एकता पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक भविष्य को भी नए सिरे से परीक्षा के दौर में खड़ा कर सकती है।
