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यह खबर केवल एक सम्मान समारोह की सूचना नहीं है, बल्कि आज के समय में मानवीय मूल्यों की पुनःस्थापना का सशक्त संदेश है। जिस दौर में व्यस्तता, स्वार्थ और रिश्तों से दूरी आम होती जा रही है, वहीं ये सात कहानियां समाज को यह याद दिलाती हैं कि माता-पिता की सेवा आज भी सर्वोच्च धर्म है।
महावीर मंदिर, पटना की ओर से दिया जाने वाला श्रवण कुमार पुरस्कार इस वर्ष एक विशेष अवसर पर प्रदान किया जाएगा। सोमवार को, आचार्य किशोर कुणाल की पहली पुण्यतिथि पर, माता-पिता की निःस्वार्थ सेवा करने वाले सात लोगों को सम्मानित किया जाएगा। यह गरिमामय समारोह दिन के 12 बजे ज्ञान भवन में आयोजित होगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, मंत्री विजय कुमार चौधरी और उद्योग मंत्री दिलीप कुमार जायसवाल होंगे। समारोह की अध्यक्षता आचार्य किशोर कुणाल के पुत्र और महावीर मंदिर के सचिव सायण कुणाल करेंगे।
इस अवसर पर सम्मानित होने वाले लोग किसी मंच के नायक नहीं, बल्कि अपने घरों में रोज़ संघर्ष करने वाले सच्चे नायक हैं।
शंभू चौधरी अपने 90 वर्षीय बिस्तर पर पड़े पिता की सेवा में पूरी तरह समर्पित हैं। पत्नी के साथ छोड़ देने के बावजूद उन्होंने पिता का साथ नहीं छोड़ा।रवि संगम, स्वयं किडनी रोग से पीड़ित होने के बावजूद, 83 वर्षीय अस्वस्थ मां की चौबीसों घंटे सेवा कर रहे हैं और इसी कारण विवाह तक नहीं किया। प्रियरंजन सैतव गंभीर रूप से बीमार पिता और वृद्ध मां की देखभाल पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। पिंकी प्रियदर्शनी सिंह पिछले दस वर्षों से अपनी पूरी तरह लाचार सास की सेवा कर रही हैं—डॉक्टरों की उम्मीद टूटने के बाद भी उनकी सेवा ने जीवन की लौ जलाए रखी है। सिद्धांत कुमार आर्थिक तंगी के बावजूद कैंसर पीड़ित मां की सेवा में कोई कमी नहीं आने देते।
तरुण कुमार बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए रात-रात भर जागते हैं। वहीं अजय कुमार मुखर्जी ने मारपीट कर घर से निकाले गए माता-पिता को सहारा दिया और ट्यूशन पढ़ाकर उनकी दवाइयों तक का इंतजाम किया।यह सम्मान समाज को यह सिखाता है कि सेवा के लिए संसाधनों से ज्यादा संवेदना जरूरी होती है। यह खबर युवाओं को सोचने पर मजबूर करती है कि सफलता केवल पद और पैसे से नहीं, बल्कि रिश्तों को निभाने से भी मापी जाती है।
महावीर मंदिर द्वारा आचार्य किशोर कुणाल की पुण्यतिथि पर ऐसा आयोजन करना उनके विचारों को जीवित रखने जैसा है। यह कार्यक्रम न केवल सम्मान देता है, बल्कि संस्कार, करुणा और कर्तव्य को समाज के केंद्र में लाने का एक प्रेरक प्रयास है।
ऐसी खबरें उम्मीद जगाती हैं और भरोसा दिलाती हैं कि इंसानियत आज भी जिंदा है।
