
रालोमो सुप्रीमो उपेन्द्र कुशवाहा के करीबी माने जाने वाले दिनारा विधायक सहित तीन विधायकों की भाजपा के नव-मनोनीत राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नीतीन नवीन के साथ वायरल तस्वीरों ने बिहार की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। इन तस्वीरों के सामने आते ही यह कयास लगने लगे थे कि उपेन्द्र कुशवाहा का दलगत ढांचा दरकने की कगार पर है। इसी बीच उनके पुत्र दीपक प्रकाश के मंत्री बनने के बाद पार्टी पदाधिकारियों के पदत्याग का सिलसिला शुरू होना इन आशंकाओं को और मजबूत करता गया।
दिनारा विधायक आलोक सिंह का राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा है। यूथ कांग्रेस से राजनीति शुरू करने वाले आलोक सिंह, कभी सासाराम से सांसद और लोकसभा स्पीकर रहीं मीरा कुमार के खास माने जाते थे, लेकिन बाद में वे उनके धुर विरोधी मंत्री अशोक चौधरी के करीबी बन गए। भाई संतोष सिंह को विधान परिषद सदस्य और मंत्री बनवाने में उनकी भूमिका भी चर्चा में रही। भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा के साथ भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की तस्वीरों में आलोक सिंह की मौजूदगी ने सियासी संकेत और गहरे कर दिए।
दीपक प्रकाश के मंत्री बनते ही रालोमो विधायक रामेश्वर महतो के बदले सुर, दिल्ली से पटना तक बढ़ी राजनीतिक गतिविधियां और नीतीन नवीन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद विधायकों की सक्रियता—ये सभी घटनाक्रम रालोमो में टूट की अटकलों को हवा दे रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का राज्यसभा सीट को लेकर अपने बेटे को मंच से नसीहत देना, “हम” और “रालोमो” के बीच बयानबाजी तथा तेजस्वी यादव के लापता पोस्टर विवाद के बीच लालू परिवार का सरकारी बंगला खाली करना, बड़े सियासी संकेत दे रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या तेजस्वी किसी बड़े राष्ट्रीय प्लान की तैयारी में हैं? क्या बंगाल चुनाव से पहले प्रियंका गांधी वाड्रा को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की आहट महागठबंधन की रणनीति का हिस्सा है? उपेन्द्र कुशवाहा के परिवार में सत्ता-संतुलन, भाजपा द्वारा दूसरी पीढ़ी की राजनीतिक एंट्री को भांपना और राज्यसभा चुनाव तक सहयोगियों को साधे रखने की कोशिश—इन सबके बीच रालोमो विधायकों का बदला सुर एनडीए की बड़ी सियासी शतरंज का ही एक मोहरा माना जा रहा है।
