खरमास की समाप्ति और सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से ठहरी सियासी गतिविधियां अब यात्राओं, संगठनात्मक कवायद और सत्ता–विपक्ष के नए समीकरणों के रूप में सामने आने लगी हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर—चारों की सक्रियता आने वाले महीनों में राजनीतिक तापमान और बढ़ाने वाली है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 16 जनवरी से राज्यव्यापी समृद्धि यात्रा पर निकलने जा रहे हैं। इस यात्रा का उद्देश्य विकास योजनाओं की समीक्षा, जनता से सीधा संवाद और सरकार की उपलब्धियों को ज़मीन पर प्रस्तुत करना है। विधानसभा चुनाव के बाद यह यात्रा न केवल सरकार की ताकत दिखाने का माध्यम बनेगी, बल्कि विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी डालेगी।
वहीं, चिराग पासवान आभार यात्रा के जरिए एनडीए के लिए समर्थन को और मजबूत करने की कोशिश करेंगे। एनडीए के भीतर यह संदेश देने की भी कवायद होगी कि गठबंधन एकजुट है और आगे की रणनीति पर पूरी तरह सक्रिय है।
दूसरी ओर, तेजस्वी यादव भी अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने के लिए यात्रा पर निकल सकते हैं। राजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती महागठबंधन को एकजुट बनाए रखने की है, खासकर तब जब कांग्रेस के कुछ विधायकों के एनडीए की ओर झुकाव की चर्चाएं तेज हैं। दही-चूड़ा भोज में कांग्रेस विधायकों की गैरमौजूदगी ने इन अटकलों को और हवा दी है।
प्रशांत किशोर की जन सुराज पहल भी आने वाले महीनों में बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ने वाली है। लगातार बिहार भ्रमण के जरिए वह खुद को एक वैकल्पिक राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं।
संगठनात्मक स्तर पर जदयू ने पंचायत से लेकर प्रदेश तक संगठन को मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी का लक्ष्य एक करोड़ सदस्य बनाने का है। वहीं भाजपा और राजद भी प्रदेश कार्यसमिति और संगठनात्मक संतुलन साधने में लगे हैं।
सरकार के स्तर पर भी बड़े फैसलों की आहट है। भाजपा नेता नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद मंत्रिमंडल में करीब दस रिक्तियां हैं। संभावना है कि बजट सत्र से पहले मंत्रिमंडल का विस्तार किया जाए। दो फरवरी से शुरू होने वाले बजट सत्र में सरकार विकास की नई दिशा और भविष्य की प्राथमिकताओं का संकेत दे सकती है।
कुल मिलाकर, खरमास के बाद बिहार की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में आती दिख रही है, जहां यात्राएं, संगठन और सत्ता के समीकरण अगले दौर की राजनीति तय करेंगे।
