पटना हाई कोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत चिकित्सकों और शिक्षकों के लिए लागू आधार-लिंक्ड फेस बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने निजता के अधिकार और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन को लेकर अहम टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की एकलपीठ ने डॉ. श्याम कुमार सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि निजता का अधिकार पूर्ण या निरपेक्ष नहीं है। यह अधिकार कानून द्वारा तय सीमाओं और व्यापक सार्वजनिक हित के अधीन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आशंका के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि फेस आधारित आधार प्रमाणीकरण या जीपीएस लोकेशन साझा करने से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को यह साबित करना जरूरी था कि बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली से उनके निजता के अधिकार का वास्तविक और प्रत्यक्ष हनन हुआ है। मात्र संभावनाओं या शंकाओं के आधार पर किसी सरकारी नीति को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। इस मामले में याचिकाकर्ता ऐसा ठोस आधार प्रस्तुत करने में असफल रहे।
हालांकि कोर्ट ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण चिंता भी जताई। न्यायालय ने कहा कि केवल फैकल्टी और डॉक्टरों की बायोमेट्रिक उपस्थिति सुनिश्चित कर देने से ही स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार नहीं होगा। यदि डॉक्टरों और मेडिकल शिक्षकों पर 24, 48 या 72 घंटे तक लगातार काम करने का दबाव डाला जाता है और उन्हें पर्याप्त विश्राम नहीं मिलता, तो ऐसी स्थिति में बायोमेट्रिक सिस्टम कोई स्थायी समाधान नहीं है।
कोर्ट ने संकेत दिया कि राज्य को स्वास्थ्य व्यवस्था में वास्तविक सुधार के लिए रिक्त पदों को भरने, संसाधन बढ़ाने और कार्य परिस्थितियों को मानवीय बनाने पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा। यह फैसला निजता, जवाबदेही और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन को रेखांकित करता है।

