बिहार सरकार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा और नीतिगत फैसला लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से जारी आदेश के अनुसार, जिन सरकारी विभागों में महिलाओं की संख्या कम है, वहां महिला अधिकारियों को महाप्रधान (Head of Department) के रूप में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। इस फैसले का उद्देश्य प्रशासनिक ढांचे में लैंगिक संतुलन स्थापित करना और निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है।
यह निर्णय बिहार सरकार की वर्ष 2016 से लागू 35 प्रतिशत महिला आरक्षण नीति का विस्तार माना जा रहा है। अब तक यह नीति मुख्य रूप से नियुक्ति और चयन प्रक्रिया तक सीमित थी, लेकिन नए आदेश के तहत नेतृत्व और शीर्ष पदों पर भी महिलाओं को प्राथमिकता देने की व्यवस्था की गई है। इससे राज्य में महिला अधिकारियों को न केवल अवसर मिलेगा, बल्कि उनकी भूमिका और प्रभाव भी मजबूत होगा।
सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा स्पष्ट किया गया है कि यह आदेश उन सभी विभागों पर लागू होगा, जहां महिला अधिकारियों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। ऐसे विभागों में योग्य महिला अधिकारियों को महाप्रधान के रूप में नियुक्त कर प्रशासनिक संतुलन सुनिश्चित किया जाएगा। यह कदम महिला अधिकारियों के मनोबल को बढ़ाने के साथ-साथ कार्यस्थल पर समानता की भावना को भी मजबूत करेगा।
इस फैसले के साथ ही बिहार सरकार ने डोमिसाइल नीति को भी सख्ती से लागू किया है। अब 35 प्रतिशत महिला आरक्षण का लाभ केवल बिहार की स्थायी निवासी महिलाओं को ही मिलेगा। सरकार का मानना है कि इससे राज्य की स्थानीय महिलाओं को अधिक अवसर मिलेंगे और वे प्रशासनिक सेवा में आगे बढ़ सकेंगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार में पहले से ही पंचायत, जीविका समूह और स्थानीय निकायों में महिलाओं की सक्रिय भूमिका देखने को मिलती रही है। अब उसी सहभागिता को राज्य स्तरीय प्रशासन और नीति निर्माण तक ले जाने की कोशिश की जा रही है।
सरकार का कहना है कि महिला नेतृत्व से न केवल प्रशासन अधिक संवेदनशील होगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक नीतियों में भी संतुलित दृष्टिकोण देखने को मिलेगा। यह फैसला महिलाओं को केवल प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि वास्तविक निर्णयकारी शक्ति देने की दिशा में उठाया गया कदम है।
कुल मिलाकर, कम प्रतिनिधित्व वाले विभागों में महिलाओं को महाप्रधान बनाने का यह निर्णय बिहार में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक और ठोस पहल माना जा रहा है, जो आने वाले समय में प्रशासनिक संस्कृति को नई दिशा दे सकता है।

