बिहार की इन बेटियों ने वह कर दिखाया, जिसकी कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। आज ये लड़कियां राज्य की पहली महिला बस ड्राइवर के रूप में पहचान बना चुकी हैं। लेकिन यह मुकाम उन्हें यूं ही नहीं मिला। इसके पीछे संघर्ष, ताने, सामाजिक दबाव और लंबे इंतजार की कहानी छिपी है।

करीब एक साल पहले तक ये लड़कियां समाज की उलाहनों और बेरोजगारी की मार झेल रही थीं। बस चलाने की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद भी उन्हें काम नहीं मिल रहा था। लोग ताने मारते थे—“लड़कियां बस चलाएंगी?”—और कई बार उनके फैसले पर सवाल उठाए जाते थे। समाज की सोच उनके हौसलों के सामने दीवार बनकर खड़ी थी।
इनमें से सिर्फ सरस्वती को छोड़कर पांच लड़कियों ने बाल विवाह के दबाव को ठुकरा दिया। उन्होंने तय किया कि वे कम उम्र में शादी नहीं करेंगी, बल्कि अपने पैरों पर खड़ी होंगी। जिन बेटियों की दुनिया अब तक खेतों और घर के कामों तक सीमित थी, उन्होंने स्टीयरिंग थामकर अपनी किस्मत की दिशा बदलने का फैसला किया।
इस बदलाव की कहानी में सामाजिक कार्यकर्ता सुधा वर्गीज की भूमिका बेहद अहम रही। उन्होंने इन लड़कियों को न सिर्फ प्रेरित किया, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास भी दिया। उस समय समाज कल्याण विभाग की अपर मुख्य सचिव हरजोत कौर का सहयोग भी इन बेटियों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आया। प्रशासनिक मदद और मार्गदर्शन से उनका सपना साकार होने की राह पर बढ़ा।
अब 14 फरवरी से ये सभी बेटियां सड़कों पर “पिंक बस” चलाते हुए नजर आएंगी। यह बस सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव का प्रतीक बनेगी। इन बेटियों ने साबित कर दिया है कि अगर हौसले बुलंद हों तो परंपराओं की जंजीरें भी टूट सकती हैं।
आज पूरा बिहार इन पर गर्व कर रहा है। ये सिर्फ बस ड्राइवर नहीं, बल्कि उन हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं जो अपने सपनों को समाज के डर से दबा देती हैं। सचमुच, सलाम है इन बेटियों को, जिन्होंने स्टीयरिंग थामकर इतिहास रच दिया।
