
Desk ASR
दिल्ली के राजौरी गार्डन से एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने शादी, रिश्तों और भावनाओं की परिभाषा को ही नया अर्थ दे दिया। यह कहानी है एक ऐसे मंडप की, जहाँ जयमाला से ठीक पहले किस्मत ने अचानक करवट ले ली। शादी का माहौल था। सजे-धजे मंडप में दूल्हा जयमाला का इंतज़ार कर रहा था। रिश्तेदार, दोस्त और मेहमान कैमरे संभाले खड़े थे। तभी अचानक भीड़ के बीच से एक युवक आगे बढ़ा। चेहरे पर घबराहट थी, आँखों में मोहब्बत और हाथों में सच्चाई। वह सीधा मंडप तक पहुँचा और सबके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
यह कोई ड्रामा नहीं था, यह प्यार का इज़हार था।लड़की की नजर उस युवक पर पड़ी तो उसकी आँखें भर आईं। वही प्रेमी, जिसे वह दिल से चाहती थी। बिना कुछ कहे, बिना किसी शोर के, वह भी धीरे से बैठ गई। दोनों की खामोशी बहुत कुछ कह रही थी।मंडप में सन्नाटा पसर गया। सबकी नजरें लड़की के पिता पर टिक गईं। शायद यही वह पल था, जहाँ एक पिता को सिर्फ समाज नहीं, बेटी का दिल भी सुनना था।
पिता ने बेटी की आँखों में देखा। वहाँ डर नहीं था, बस उम्मीद थी। कुछ पल की चुप्पी के बाद उन्होंने ऐसा फैसला लिया, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। उन्होंने बेटी का हाथ उठाया और प्रेमी के हाथ में थमा दिया। आँखों में आँसू और चेहरे पर सुकून था। बारात लेकर आने वाला लौट गया, लेकिन प्रेम लेकर आने वाला जीत गया।
यह सिर्फ एक शादी नहीं टूटी, बल्कि एक मोहब्बत को मंज़िल मिल गई। राजौरी गार्डन का यह मंडप आज भी उस पिता के फैसले की मिसाल बन चुका है, जिसने समाज से पहले अपनी बेटी की खुशी चुनी।
