
Desk ASR
बिहार की राजनीति एक बार फिर पोस्टर वॉर के नए अध्याय में दाखिल हो चुकी है। इस बार निशाने पर हैं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव। बीजेपी के सोशल मीडिया हैंडल से शेयर किए गए पोस्टर में लिखा गया – “लापता की तलाश ! नाम: तेजस्वी यादव, पहचान: 9वीं फेल”। यह पोस्टर महज एक तंज नहीं, बल्कि 2025 की सियासी बिसात पर बिछाई जा रही रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
बीजेपी का आरोप है कि चुनावी नतीजों के बाद तेजस्वी यादव सार्वजनिक मंचों से गायब हैं, न विधानसभा में सक्रिय दिख रहे हैं और न ही सड़कों पर सरकार के खिलाफ आंदोलन करते। इसी “गायब” नैरेटिव को मजबूत करने के लिए यह पोस्टर सामने लाया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विपक्ष की अनुपस्थिति सबसे बड़ा मुद्दा है, या यह ध्यान भटकाने की राजनीति है?
पोस्टर में ‘9वीं फेल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल बहस को और तीखा बना देता है। आलोचक इसे व्यक्ति पर हमला और राजनीति के गिरते स्तर का उदाहरण बता रहे हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में बहस शिक्षा प्रमाणपत्रों पर नहीं, नीतियों, बेरोजगारी, महंगाई और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर होनी चाहिए। वहीं बीजेपी समर्थकों का तर्क है कि यह पोस्टर सत्ता में रहने के दौरान किए गए वादों और विपक्ष की जिम्मेदारी याद दिलाने का तरीका है। सोशल मीडिया पर यह पोस्टर तेजी से वायरल हो चुका है और समर्थक–विरोधी खेमों में तीखी नोकझोंक चल रही है।
असल सवाल यह नहीं कि पोस्टर कितना वायरल हुआ, बल्कि यह है कि बिहार की राजनीति कब पोस्टरों से निकलकर जनता के असली सवालों तक पहुंचेगी। ‘लापता’ कौन है – नेता या मुद्दे? शायद इसका जवाब आने वाले महीनों में बिहार की राजनीति खुद देगी।
