
Desk ASR
रात के ठीक 1 बजे थे। शहर की गलियाँ लगभग सो चुकी थीं, लेकिन एक कमरे के भीतर भरोसे का सबसे खौफनाक कत्ल होने वाला था। सिविल इंजीनियर ममता, जो अपने भविष्य के सपनों और रिश्ते की उलझनों को सुलझाने आई थी, उसे क्या पता था कि यह मुलाक़ात उसकी आख़िरी होगी। सामने था संदीप यादव—शादीशुदा, भीतर से उबलता हुआ, शक और डर से भरा।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, ममता और संदीप के बीच लंबे समय से संबंध थे। ममता संदीप पर शादी का दबाव बना रही थी, जबकि संदीप अपनी सामाजिक छवि, पत्नी और परिवार के बीच फंसा हुआ था। उसी रात ममता “आख़िरी बातचीत” के इरादे से मिलने पहुँची। कमरे में बात शुरू हुई—पहले धीमी आवाज़ में, फिर तीखे तानों और आरोपों में बदल गई।
बताया जा रहा है कि ममता ने संदीप से साफ कहा कि वह अब छुपकर नहीं जीना चाहती। यहीं संदीप का डर गुस्से में बदल गया। उसे लगा कि ममता उसके राज़ सबको बता देगी। यही डर उसे हैवान बनाने के लिए काफी था। अचानक संदीप ने पास रखी कुल्हाड़ी उठाई और ममता पर ताबड़तोड़ वार कर दिए। चीख़ों के बीच भरोसा लहूलुहान हो गया।
घटना के बाद संदीप ने सबूत मिटाने की कोशिश की, लेकिन खून की कहानी ज़्यादा देर छुप नहीं सकी। पुलिस ने उसे हिरासत में लिया तो उसके चेहरे पर पछतावे से ज़्यादा पकड़े जाने का डर था। यह सिर्फ़ एक हत्या नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जहाँ प्यार, पज़ेसिवनेस और सामाजिक दबाव मिलकर इंसान को राक्षस बना देते हैं। सवाल यही है – क्या रिश्तों में सच और हिम्मत होती, तो क्या ममता आज ज़िंदा होती?
