पटना की सड़कों, पार्कों और वीरान इलाकों में अगर ध्यान से देखा जाए, तो एक खतरनाक सच्चाई सामने आती है। जगह-जगह पड़े इस्तेमाल किए हुए इंजेक्शन इस बात की गवाही देते हैं कि शहर में नशे का इंजेक्शन संस्कृति तेजी से पैर पसार रही है। यह कोई साधारण समस्या नहीं, बल्कि एक ऐसा ज़हर है जो खामोशी से युवाओं की नसों में उतरता जा रहा है और उनके भविष्य को अंधकार की ओर धकेल रहा है।


इस नशे की सबसे बड़ी मार युवा पीढ़ी पर पड़ रही है। पढ़ाई, रोजगार और सपनों की उम्र में युवा नशे के जाल में फंसकर मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं। यह लत केवल शरीर को ही नहीं तोड़ती, बल्कि सोचने-समझने की क्षमता, आत्मविश्वास और सामाजिक जिम्मेदारी को भी खत्म कर देती है। नतीजतन अपराध, हिंसा और असामाजिक गतिविधियों में वृद्धि होती है, जिनकी जड़ में अक्सर नशे की लत छिपी रहती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो समस्या खुलेआम सड़कों पर दिखाई दे रही है, उस पर सरकार और प्रशासन की नजर क्यों नहीं पड़ रही। क्या व्यवस्था सच में अनजान है, या सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे हुए है? और अगर इससे भी आगे सोचें, तो क्या इस पूरे अवैध कारोबार में किसी स्तर पर मिलीभगत की आशंका से इनकार किया जा सकता है?
अगर प्रशासन की कोई संलिप्तता नहीं है, तो फिर प्रतिबंधित नशीली दवाएं और इंजेक्शन इतनी आसानी से युवाओं तक कैसे पहुंच रहे हैं। आखिर इनकी सप्लाई कहां से हो रही है, कौन इस नेटवर्क को चला रहा है और अब तक इस पर निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? ये सवाल जवाब मांगते हैं, सिर्फ आश्वासन नहीं।
यह मसला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य के भविष्य से जुड़ा हुआ है। अगर आज ठोस और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यही युवा एक खोई हुई पीढ़ी बन सकते हैं। सरकार और पुलिस को नशे के इस नेटवर्क पर तत्काल कठोर कार्रवाई करनी होगी और यह स्पष्ट करना होगा कि शहर तक यह ज़हर पहुंच कैसे रहा है।
पटना के युवाओं को नशे से बचाना सिर्फ सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य को सुरक्षित करने की लड़ाई है। अगर अब भी लापरवाही जारी रही, तो आने वाला इतिहास इस चुप्पी और निष्क्रियता को कभी माफ नहीं करेगा।
