बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज है। पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह की जनता दल (यूनाइटेड) में संभावित वापसी को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। इस मुद्दे ने तब और तूल पकड़ लिया जब खुद आरसीपी सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपना राजनीतिक अभिभावक बताते हुए 25 साल पुराने रिश्ते का हवाला दिया। हालांकि, जदयू के भीतर इस वापसी को लेकर एकराय नहीं दिख रही। पार्टी के बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने खुलकर विरोध का झंडा बुलंद कर दिया है, जबकि नीतीश कुमार की चुप्पी ने पूरे मामले को रहस्यमय बना दिया है।

आरसीपी सिंह के बयान को जदयू में वापसी की जमीन तैयार करने के तौर पर देखा जा रहा है। पटना में एक सामाजिक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने नीतीश कुमार के विकास कार्यों की जमकर तारीफ की और इशारों-इशारों में यह संकेत दिया कि राजनीति में रिश्ते कभी खत्म नहीं होते। हालांकि, उन्होंने सीधे तौर पर जदयू में वापसी की पुष्टि नहीं की, लेकिन उनके शब्दों ने अटकलों को हवा दे दी।
इसी बीच, ललन सिंह का सख्त रुख सामने आया। लखीसराय में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने 2020 के विधानसभा चुनावों का जिक्र किया और आरसीपी सिंह की भूमिका पर सवाल उठाए। ललन सिंह ने कहा कि जिस दौर में टिकट बंटवारे और रणनीति की जिम्मेदारी आरसीपी सिंह के पास थी, उस समय पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जदयू को कमजोर करने वाले चेहरों के लिए अब संगठन में कोई जगह नहीं है। उनके इस बयान को “नो एंट्री” के स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
विवाद को और बल तब मिला जब जदयू विधायक श्याम रजक ने यह कह दिया कि “आरसीपी सिंह गए ही कब थे।” हालांकि, पार्टी नेतृत्व की ओर से इस बयान पर न तो समर्थन आया और न ही खंडन, जिससे भ्रम की स्थिति बनी रही।
सबसे अहम भूमिका मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की है। जदयू में अंतिम फैसला उन्हीं का माना जाता है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर उनकी चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार फिलहाल पार्टी के अंदरूनी समीकरणों और शक्ति संतुलन को परख रहे हैं। अगर वे चाहें तो विरोध के सुर भी थम सकते हैं, लेकिन अभी तस्वीर साफ नहीं है।
आरसीपी सिंह के लिए यह वापसी सिर्फ राजनीतिक इच्छा नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। जदयू से अलग होने के बाद वे कोई मजबूत जनाधार नहीं बना पाए। भाजपा में अपेक्षित महत्व न मिलना, अपनी नई पार्टी का सीमित प्रभाव और फिर जन सुराज के साथ विलय—ये सभी कदम उनकी कमजोर होती स्थिति की ओर इशारा करते हैं।
एक समय नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद अफसर और बाद में उत्तराधिकारी माने जाने वाले आरसीपी सिंह आज सियासी हाशिये पर खड़े नजर आते हैं। अब सवाल यही है कि क्या नीतीश कुमार पुराने रिश्तों को तवज्जो देंगे या पार्टी संगठन की वर्तमान दिशा को प्राथमिकता देंगे। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि जदयू के दरवाजे आरसीपी सिंह के लिए फिर खुलेंगे या यह अध्याय हमेशा के लिए बंद हो चुका है।
