बिहार के उपमुख्यमंत्री सह सहकारिता मंत्री सम्राट चौधरी का हालिया बयान—“तीन महीने में अपराधियों को बिहार से बाहर खदेड़ देंगे”—अभी राजनीतिक गलियारों में गूंज ही रहा था कि दूसरे ही दिन राजधानी पटना से एक चौंकाने वाला नजारा सामने आ गया। मुख्यमंत्री आवास के पास, जिसे राज्य का सबसे सुरक्षित वीआईपी इलाका माना जाता है, भारी संख्या में बाइकर्स का काफिला कानून को ठेंगा दिखाता नजर आया।
बिना हेलमेट, तेज रफ्तार, साइलेंसर से धमाके, ट्रैफिक नियमों की खुलेआम अनदेखी—सब कुछ एक साथ। सवाल यह नहीं कि यह नजारा आम इलाके में दिखा, सवाल यह है कि यह सब सीएम हाउस के पास हुआ, जहां चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा की व्यवस्था और पुलिस तैनाती रहती है। ऐसे में पटना पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठना लाज़मी है।
जब वीआईपी जोन में इस तरह की अराजकता को नहीं रोका जा सका, तो आम सड़कों, मोहल्लों और कस्बों की स्थिति की कल्पना करना मुश्किल नहीं है। आम लोग पहले से ही तेज रफ्तार बाइकर्स, स्टंटबाजी और सड़क पर गुंडागर्दी से परेशान हैं। आए दिन हादसे हो रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कभी-कभार चालान और औपचारिक ड्राइव ही देखने को मिलती है।
सम्राट चौधरी के बयान के बाद अब जनता पूछ रही है—अगर अपराधियों और कानून तोड़ने वालों पर सख्ती दिखानी है, तो शुरुआत कहां से होगी? क्या ऐसे बाइकर्स भी उसी श्रेणी में नहीं आते जो सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं? क्या इनके खिलाफ सिर्फ सोशल मीडिया वीडियो वायरल होने के बाद ही एक्शन होगा?
यह मामला सिर्फ ट्रैफिक नियमों का नहीं, बल्कि कानून के डर के खत्म होते जाने का संकेत है। अगर सरकार और पुलिस मिलकर ऐसे खुले उल्लंघनों पर तुरंत और सख्त कार्रवाई नहीं करती, तो “अपराध मुक्त बिहार” का दावा महज़ एक राजनीतिक जुमला बनकर रह जाएगा। अब निगाहें सम्राट चौधरी और राज्य पुलिस पर हैं—क्या यह चेतावनी भर थी या सच में ज़मीन पर असर दिखेगा?
