पटना स्थित आवास पर राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की ओर से आयोजित लिट्टी-चोखा भोज सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। वजह सिर्फ भोज नहीं, बल्कि पार्टी के तीनों विधायकों—माधव आनंद, रामेश्वर महतो और आलोक सिंह—की गैरमौजूदगी रही। यह अनुपस्थिति केवल औपचारिक चूक नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके पीछे पार्टी की मौजूदा राजनीति और अंदरूनी हालात का संकेत देखा जा रहा है।
उपेंद्र कुशवाहा ने हाल के महीनों में खुद को बिहार की राजनीति में एक वैकल्पिक ओबीसी नेतृत्व के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। लिट्टी-चोखा जैसे भोज के जरिए उन्होंने ‘मिट्टी से जुड़े नेता’ की छवि को मजबूत करने का संदेश दिया। लेकिन जब अपनी ही पार्टी के विधायक इस मंच से दूर रहे, तो सवाल उठना लाजमी है कि संगठनात्मक एकजुटता कहां तक कायम है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आरएलएम इस वक्त पहचान के संकट से गुजर रही है। न तो पार्टी सत्ता पक्ष में निर्णायक भूमिका में है और न ही विपक्ष में कोई मजबूत धुरी बना पाई है। विधायकों की दूरी यह संकेत देती है कि पार्टी के भीतर रणनीति और भविष्य को लेकर असमंजस है। कुछ नेता अपने-अपने राजनीतिक विकल्प टटोलने में लगे हैं, जबकि केंद्रीय नेतृत्व जमीन पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटा है।
बिहार की राजनीति में जहां बड़े दल जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने में आक्रामक हैं, वहां आरएलएम का स्पेस सीमित होता जा रहा है। ऐसे में लिट्टी-चोखा पार्टी जैसे आयोजन प्रतीकात्मक तो हैं, लेकिन संगठन को मजबूती देने के लिए इससे आगे ठोस राजनीतिक रोडमैप की जरूरत है।
कुल मिलाकर, उपेंद्र कुशवाहा की यह पहल संदेश तो देती है, मगर विधायकों की गैरहाजिरी ने यह भी साफ कर दिया है कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा का मौजूदा सियासी मुकाम अस्थिर है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि पार्टी अंदरूनी मतभेद सुलझाकर खुद को किस दिशा में ले जाती है।

